Monday, October 21, 2019

कहने को लम्हे हैं कश्तियाँ नयी सजानी हैं , फिर जूनून  ऐसा कभी दिखता भी नहीं।
सोते जागते हर वक़्त इस बेखयाली से गुज़ारना कुछ यूँ लगा जैसे मानो सारी बेचैनियां यहीं पर निपट सी गयी थी।
कितने गीत सुनाये या   पंक्तियों के बीच की पहेलियाँ सुलझाना, अब रास आने लगा है ये बेतरतीब ढंग से बहाने बनाना और रूठ जाना।
गिन न सकें इतनी बातें और उन बातों ही बातों में   असीम गहराई तक समां जाना भी थकाता न है और फिर हँस के कुछ कह देना जो सुना तोह नहीं पर महसूस हो जाना।
रास्तें लम्बे हैं रास्ते मुश्किल हैं,  साथ भी हैं यादों का फैला एक लम्बा कालीन जो मंज़िल तक जाए पर मना है अकेले जाना।
सुनने में कुछ खूब है ऐसी ग़ज़ल, ऐसा राग जो दिल तक पहुंचे और धीरे से उस अजीब सी आवाज़ का मुझे पुकार जाना।
दिन रात बस यही सोचते रह जाना...


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